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Monday, January 2, 2017

नए साल में...




कब आएगा

वो नया साल

जब तुम समझोगे

ये तड़प

जो सर उठाती है

किसी मुद्दे या

   बहस में

किसी झूठ या

     खाईं में

और बार बार

तब्दील होती है

एक नज़र में

   एक आवेग में

एक निर्लज्ज

  छटपटाहट में

  कोई-न-कोई

बहाना बना

  हर दफ़ा पहुँचती है

तुम्हारे क़दमों तले

बिछने के लिए

   आतुर

तुम्हारे मन को

बेधने के लिए

   मचलती

तुम्हारी गर्म हथेली से

अपनी हथेली

रगड़कर

एक नयी उड़ान भरने को 

बेसब्र।


समझोगे

कब

इस चौंकाती

ज़ालिम तड़प

का सफ़र, ताकि

रोक लो 

ख़ुद को

   बारम्बार

ऐसा कुछ

कहने

के पहले

जो कुचल दे

मेरी रूहानी भूख,

धकेल दे उसे

उन्हीं थके-हारे

  सन्नाटों में, पूर्व-परिभाषित

  दायरों में,

जिन्हें ईजाद किया

गया था, सिर्फ़

बेलौस

मोहब्बत की

लपटें

बुझाने

के लिए.



पुरानी लखौड़ी


न तुम हो
मेरे पीपल
न मैं तुम्हारी
अमरलता,
न तुम हो
आवारा
बादल, न मैं
तुम्हें सोखती
जलधारा.
दरअस्ल
हम-तुम हैं
  दरकती हुई
दीवारों में धंसी
  सदियों पुरानी
आंच
  में पकी
लखौड़ी ईंटें
  अपने इतिहासों की
आँधियों से
   बग़ैर मुँह चुराए
भूखी सीपों
की तरह
  पीते पोर-पोर में
अपने वर्तमानों
के तूफ़ान,
 बार-बार उस
माटी में
भुरभुराकर
   बिखरने के लिए
जिसमें
उगा सकें
   अपनी नयी कविता
बासी उपमाओं
    तुलनाओं-ठप्पों
 से आज़ाद
गुंथी हुई उँगलियों
 उलझी हुई टांगों
  कसकते हुए दिलों
  में धमकती
     वज़नी साँसों
 की धौंकनी
 में से
  कुनमुनाती, इठलाती
कभी न ख़त्म
होने वाली
रातों में
खोजे
  हर स्पंदन से
कोहराम मचाती
चांदनी की लपटों
में बनते रहें
दहकते शोले
 अपनी आत्मा के
सच से
 अपने हिंसक
इतिहासों की
ख़ामोशियों को
 गुमनाम-कुचले
 सूरजों की
 रौशनियों
 से चीरें
निर्भीक।

Thursday, December 29, 2016

घर आते परदेसी

१. सुर संभालिये, देवी जी

(लखनऊ, ३ दिसंबर २०१६ )

जब जब
निडर होकर
नाम लेती हूँ
इस मुल्क की
गली-गली में
पलती
किसी घिनौनी सच्चाई का
किसी सियासी झूठ का
किसी क़त्लेआम का
किसी शर्मनाक हैवानियत का
तो
मुझसे कहा जाता है
कि पहले देखो
अपने घर को
अपने वतन को
अपने नए राष्ट्रपति को
तब
मुँह से आवाज़ निकालना...
और
मैं अपनी
तड़प जज़्ब करके
पलटती हूँ
अपने आरोपी पर
कि
घरों  के नाम पर
मेरी आवाज़ को
बेघर न कर सकोगे
कि
मेरे सुरों की तरंगे
किसी की देहरी के भीतर
रस्सी से बंधी
कोई बेज़ुबान
पालतू गाय नहीं
जो माता बनकर
खुद अपनी ही मौत पर
हुंकार न सके
रंभा न सके
और मरते मरते भी
उस मंदिर की कच्ची ईंटों
को लात मारकर
गिरा न सके
जिसमें वो सिर्फ़
किसी की ग़ुलाम
या हथकंडा
बनकर
'माता' नाम की क़ैद को
धर्म मानकर
सबको अपने दोहन
का हक़
देती रही.

२. भूरी चमड़ी की जांच-पड़ताल उर्फ़ तुरुप-देस में रैंडम सर्वे 

(मिनियापोलिस-सेंट पॉल अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट, २१ दिसंबर २०१६)

पहला चरण
आप कहाँ से आयी हैं?
आप क्या लायी हैं?
आपका घर कहाँ है?
आप यहीं की हैं
तो ठीक है
आ जाइये
अब आपको और
तकलीफ़ नहीं देंगे।

२० मिनट बाद
अरे, अरे,  मैम!
कहाँ चलीं आप?
आपने तो ख़ामख़ां समझ लिया
हम आपसे और जवाब
तलब नहीं करेंगे
ज़रा रुकिए
ये तो बताइये
कितनी बार जाती हैं
अपने उस देश
क्या करती हैं वहाँ,
और फिर यहाँ?
ओहो, तो यहीं रहती हैं आप
अच्छा, नागरिक भी हैं!
घर यहाँ है तो
फिर वहाँ भी कैसे है?
बेटी यहाँ है तो
परिवार वहाँ भी कैसे है?
काम यहाँ है
तो वहाँ भी कैसे है?

चलिए इसी बात पर
खोल डालिये
अपना सारा सामान
अपना आगा-पीछा
और पूरी की पूरी
समा जाइये
हमारी स्मार्ट एक्स-रे
मशीन के भीतर
तभी तय कर पाएंगे
आपकी रिहाई
कब और कैसे हो.
बाय द वे,
हमारे इस 'प्रोसेस'
से घबराकर
यह न समझ बैठियेगा कि
हमारे इस महान देश के
सारे नागरिक
बराबर नहीं है.
ये तो सिर्फ़
देश की हिफ़ाज़त
के लिए एक
रैंडम सर्वे है.
कोशिश रहेगी
इससे आप
अगली बार भी
पूरी तरह भयभीत होकर
सफ़र करें।
याद रहे, इस मुल्क में
भूरी चमड़ी का अर्थ है
सदा संदिग्ध चमड़ी
अब सर्वे ख़त्म।

ब्रह्माण्ड के इस
सबसे आज़ाद मुल्क में
आपका
स्वागत है.



 वेबसाइट- http://richa.nagar.umn.edu